पुरुषार्थ: भाग्य बनाम कर्म
रश्मिरथी: दानवीर कर्ण का महागाथा
मैंने दिनकर जी की कविता 'रश्मिरथी' पढ़ी, जो वास्तव में एक उच्च कोटि की रचना है। इसमें कर्ण के चरित्र का जो चित्रण किया गया है, वह अद्वितीय है। महाभारत के युद्ध में, यह जानते हुए भी कि वह अधर्म के पक्ष में है, कर्ण जिस निष्ठा के साथ लड़ा, वह उसकी अटूट प्रतिबद्धता को दर्शाता है।
एक अद्वितीय व्यक्तित्व
कर्ण न केवल एक महान धनुर्धर था, बल्कि वह परम ज्ञानी और दानवीर भी था। उसकी वीरता ऐसी थी कि स्वयं भगवान कृष्ण भी विचार करते थे कि क्या वे अपने सुदर्शन चक्र से उसके पुरुषार्थ को रोक पाएंगे?
अदम्य साहस: वह अपने विनाश को सामने देखते हुए भी विचलित नहीं हुआ।
महादानी: वह ऐसा दानी था जिसने शीश झुकाकर वह सब कुछ दे दिया जो किसी ने भी उससे मांगा।
स्वाभिमान: अर्जुन से लड़ने के लिए उसने अपना सब कुछ दांव पर लगा दिया। उसने कभी समझौता नहीं किया, न ही कभी झुका; उसने वही किया जो उसके अंतर्मन को सही लगा।
संघर्ष और पुरुषार्थ की प्रतिमूर्ति
हमें कर्ण के जीवन से बहुत कुछ सीखने को मिलता है। वह शरीर को मात्र एक मूर्ति मानता था, फिर भी उसी शरीर और अपने तप के बल पर उसने पूरे ब्रह्मांड को हिला देने की क्षमता रखी।
"शायद ही कोई ऐसा शूरवीर हुआ हो जिसका जीवन इतने संघर्षों से भरा रहा।"
अभागा बचपन: सूर्यपुत्र होने के बाद भी उसे 'राधेय' कहलाना पड़ा। क्षत्रिय होकर भी उसे 'सूत-पुत्र' का अपमान सहना पड़ा। न बचपन में माँ का ममतामयी दूध मिला, न जीवनभर भाइयों का प्रेम।
स्वयं का निर्माण: उसने संसार में अपनी जगह अपने पुरुषार्थ के दम पर बनाई।
गुरु परशुराम और कर्ण की सहनशक्ति
उसका एक प्रसंग अत्यंत मार्मिक है जब वह गुरु परशुराम के आश्रम में ब्राह्मण बनकर शस्त्र विद्या सीख रहा था। एक बार जब गुरु उसकी जंघा पर सिर रखकर सो रहे थे, तब एक विषैले कीट ने उसकी जंघा को काटना शुरू कर दिया।
गुरु की नींद न खुले, इसलिए कर्ण टस से मस नहीं हुआ, भले ही वह कीट उसका मांस कुतरता रहा।
जब रक्त की गर्माहट से गुरु की नींद खुली, तो वे आश्चर्यचकित रह गए। उन्होंने कहा, "इतनी पीड़ा एक ब्राह्मण सहन नहीं कर सकता, तुम निश्चित ही क्षत्रिय हो।"
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