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Fulltime to Contract

 Fired in 13 days of working in staffing firm is it fare the staffing market has become fragile companies are losing faith and becoming too  much eager to get the placement in first few months now how to play smart in it one should charge high salary i am studying ai ml and will not prefer fulltime role but only side hustle or contract role which pays well.

Bet to get

 what do you think whats is the good strategy is it to loss 10 percent 30 percent of the times and then make money above 30 percent the rest and keep riding the profit when the market gives raising the sell price each time market goes above 20 percent - 1st time 20 percent dont do anything when 30 percent dont do when 40 percent lock at 30 percent profit and go on doing it - with each 40 percent locking 20 percent profit.when 10 x - atleast take 9 x.

इंसानियत फिर एक बार शर्मसार हुई

 अक्सर जब थोड़ा करीब से हर चीज़ को देखा जाए, तो यहाँ सब बहुत सामान्य (normal) लगने लगता है क्योंकि यह इंसान की फितरत बनती जा रही है कि दूसरे का शोषण करो अपने स्वार्थ के लिए। फिर अगर इंसान ही इंसान का शोषण करे, तो इसमें आश्चर्य की क्या बात है? जब एक सिस्टम का मकसद ही यही है कि वह ज़्यादा से ज़्यादा 'प्रॉफिट' बनाए अपने मालिक के लिए, तो इसमें क्या अचरज करना कि वह मालिक सबका शोषण करे खुद को ठीक रखने के लिए, और कोई ऐसा काम कर जाए जिसे कोई सोच भी न सके। इसीलिए हिंदू धर्म में शरीर, मन और प्रकृति को चेतना (Consciousness) के नीचे रखा गया है और हमें चेतना से भी ऊपर जाना है, जहाँ सब एक हो जाएँ—खुद में और इस मिट्टी या ब्रह्मांड में कोई अंतर न लगे। यह आश्चर्य की बात है न कि हम 'अचूक' (accurate) होते जा रहे हैं, फिर भी ज़िंदगी की गहराइयाँ खोती जा रही हैं। जितना सामान और सामग्री हम जुटा रहे हैं, उतना ही खुशी से दूर भागते जा रहे हैं। जितनी टेक्नोलॉजी हमें अपनों के पास ला रही है, उतना ही अपनत्व कम होता जा रहा है। पता नहीं कैसी अजीब सी दुनिया होती जा रही है, यहाँ कैसे लोग होते जा रहे हैं! ता...

एक अनकहा सुकून

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पता नहीं जीवन कहाँ जा रहा है। एक बात बस यहाँ तक पता लगा है कि ज़िंदगी में कुछ तो चाहिए— अलग बात है कि अभी ज़िंदगी की तलाश सबसे ज़्यादा ज़रूरी थी, ताकि अपने परिवार को एक इज़्ज़त भरी ज़िंदगी दे पाऊँ। बाक़ी आगे का रास्ता साफ़ नहीं दिखता। थोड़ा-थोड़ा बचपन की चीज़ों को एंजॉय करने का मन कर रहा है— खेलना, खाना… अजीब बात है न? एक अजीब-सी तलाश में हम सब रहते हैं, जो शायद हमारे अंदर ही होती है। जब हम बच्चे होते हैं, जो चीज़ें हमें अच्छी लगती हैं, शायद वही हमारे लिए सही होती हैं। पेंटिंग और राइटिंग मुझे हमेशा से अच्छी लगी है। एक अजीब-सा सुकून मिलता है जब मैं पेंसिल से लिखता हूँ, रेखाएँ खींचकर ड्रॉइंग तैयार करता हूँ  और उसमें रंग भरता हूँ। या यूँ कहूँ कि मुझे ये किसी god ka creation से कम नहीं लगतीं। ऐसा लगता है जैसे मैं खुद एक ज़िंदगी बना रहा हूँ।

पुरुषार्थ: भाग्य बनाम कर्म

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रश्मिरथी: दानवीर कर्ण का महागाथा मैंने दिनकर जी की कविता 'रश्मिरथी' पढ़ी, जो वास्तव में एक उच्च कोटि की रचना है। इसमें कर्ण के चरित्र का जो चित्रण किया गया है, वह अद्वितीय है। महाभारत के युद्ध में, यह जानते हुए भी कि वह अधर्म के पक्ष में है, कर्ण जिस निष्ठा के साथ लड़ा, वह उसकी अटूट प्रतिबद्धता को दर्शाता है। एक अद्वितीय व्यक्तित्व कर्ण न केवल एक महान धनुर्धर था, बल्कि वह परम ज्ञानी और दानवीर भी था। उसकी वीरता ऐसी थी कि स्वयं भगवान कृष्ण भी विचार करते थे कि क्या वे अपने सुदर्शन चक्र से उसके पुरुषार्थ को रोक पाएंगे? अदम्य साहस: वह अपने विनाश को सामने देखते हुए भी विचलित नहीं हुआ। महादानी: वह ऐसा दानी था जिसने शीश झुकाकर वह सब कुछ दे दिया जो किसी ने भी उससे मांगा। स्वाभिमान: अर्जुन से लड़ने के लिए उसने अपना सब कुछ दांव पर लगा दिया। उसने कभी समझौता नहीं किया, न ही कभी झुका; उसने वही किया जो उसके अंतर्मन को सही लगा। संघर्ष और पुरुषार्थ की प्रतिमूर्ति हमें कर्ण के जीवन से बहुत कुछ सीखने को मिलता है। वह शरीर को मात्र एक मूर्ति मानता था, फिर भी उसी शरीर और अपने तप के बल पर उसने पूरे ...

Whiskey songs and company

"दारू का नशा जब हल्का-हल्का सा होता है, तभी अच्छा लगता है; जैसे दुनिया मधुर सी लगती है, जैसे मैं झूम सा रहा हूँ, जैसे एक नदी की धारा में बहा जा रहा हूँ और चिंता मुक्त हूँ। और जब व्हिस्की के साथ अच्छा सा साथी हो और अच्छे से गीत और ग़ज़ल का दौर हो, तो उसका मज़ा ही कुछ और होता है। आखिर ऐसा क्यों है? शायद हम ऐसी ज़िंदगी जी रहे हैं जिससे हमें ही घिन आती है और हम एक छुटकारा सा चाहते हैं।

"नदी, मनुष्य और सागर: एक आध्यात्मिक यात्रा"

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"यह भी कोई ज़िंदगी है? कुछ समझ में नहीं आ रहा है कि क्या करना है और न ही यह समझ आ रहा है कि क्यों करना है। बस सब लोग कर रहे हैं, इसलिए 'करे जाओ-करते जाओ' वाला हाल है। जब कुछ नहीं करो तो करने का मन करता है, और जब कुछ करो तो लगता है कि जो कर रहे हैं उससे क्या उखाड़ लेंगे? न अपना कुछ कर पा रहे हैं, न दूसरों का। क्या कुछ ऐसा करने का कोई और रास्ता हो सकता है जिससे ज़िंदगी में सुकून मिले और अच्छा भी लगे? जीवन में एक अजीब सी बेचैनी है, आज कहीं भी ध्यान केंद्रित (focus) नहीं हो पा रहा है। शायद यह टेक्नोलॉजी के ज़्यादा इस्तेमाल की वजह से हुआ है। अब से बस एक काम को एक ही बार में पूरा करना है—जब लिख रहा हूँ, तो बस लिखता ही रहूँ और कुछ नहीं। यह बेचैनी सबको मुझसे बेहतर स्थिति में देख कर भी हो रही है; सबके पास कार है, पैसा है और मैं अगले हफ्ते से नौकरी शुरू करूँगा। हाँ, मुझे नई-नई किताबें पढ़ने में थोड़ा बहुत शौक है, चाहे वे हिंदी में हों या अंग्रेजी में, बस कहानी अच्छी होनी चाहिए।" "ज़िंदगी एक नदी की धारा की तरह ही होती है न? जब वह निकलती है तो अपने पूरे प्रवाह में होती है, अ...