एक अनकहा सुकून

पता नहीं जीवन कहाँ जा रहा है। एक बात बस यहाँ तक पता लगा है कि ज़िंदगी में कुछ तो चाहिए—
अलग बात है कि अभी ज़िंदगी की तलाश सबसे ज़्यादा ज़रूरी थी,
ताकि अपने परिवार को एक इज़्ज़त भरी ज़िंदगी दे पाऊँ।

बाक़ी आगे का रास्ता साफ़ नहीं दिखता।
थोड़ा-थोड़ा बचपन की चीज़ों को एंजॉय करने का मन कर रहा है—
खेलना, खाना…
अजीब बात है न?

एक अजीब-सी तलाश में हम सब रहते हैं,
जो शायद हमारे अंदर ही होती है।
जब हम बच्चे होते हैं,
जो चीज़ें हमें अच्छी लगती हैं,
शायद वही हमारे लिए सही होती हैं।

पेंटिंग और राइटिंग मुझे हमेशा से अच्छी लगी है।
एक अजीब-सा सुकून मिलता है
जब मैं पेंसिल से लिखता हूँ,
रेखाएँ खींचकर ड्रॉइंग तैयार करता हूँ 
और उसमें रंग भरता हूँ।

या यूँ कहूँ कि मुझे ये किसी god ka creation से कम नहीं लगतीं।
ऐसा लगता है जैसे मैं खुद एक ज़िंदगी बना रहा हूँ।





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