इंसानियत फिर एक बार शर्मसार हुई

 अक्सर जब थोड़ा करीब से हर चीज़ को देखा जाए, तो यहाँ सब बहुत सामान्य (normal) लगने लगता है क्योंकि यह इंसान की फितरत बनती जा रही है कि दूसरे का शोषण करो अपने स्वार्थ के लिए।

फिर अगर इंसान ही इंसान का शोषण करे, तो इसमें आश्चर्य की क्या बात है? जब एक सिस्टम का मकसद ही यही है कि वह ज़्यादा से ज़्यादा 'प्रॉफिट' बनाए अपने मालिक के लिए, तो इसमें क्या अचरज करना कि वह मालिक सबका शोषण करे खुद को ठीक रखने के लिए, और कोई ऐसा काम कर जाए जिसे कोई सोच भी न सके।

इसीलिए हिंदू धर्म में शरीर, मन और प्रकृति को चेतना (Consciousness) के नीचे रखा गया है और हमें चेतना से भी ऊपर जाना है, जहाँ सब एक हो जाएँ—खुद में और इस मिट्टी या ब्रह्मांड में कोई अंतर न लगे। यह आश्चर्य की बात है न कि हम 'अचूक' (accurate) होते जा रहे हैं, फिर भी ज़िंदगी की गहराइयाँ खोती जा रही हैं। जितना सामान और सामग्री हम जुटा रहे हैं, उतना ही खुशी से दूर भागते जा रहे हैं। जितनी टेक्नोलॉजी हमें अपनों के पास ला रही है, उतना ही अपनत्व कम होता जा रहा है।

पता नहीं कैसी अजीब सी दुनिया होती जा रही है, यहाँ कैसे लोग होते जा रहे हैं! ताकत कुछ ही लोगों के हाथों में सिमटती जा रही है और वे जो चाहें वो कर सकते हैं। इसका बहुत बड़ा कारण हम खुद भी हैं—हम बिना समझे चीज़ें खरीदते हैं या उन लोगों के लिए काम करते हैं जिनके सिद्धांत ही शुरू से शोषण के रहे हैं। चुनाव आज हमारे हाथों में है कि हम अपना पैसा, समय और वोट किसको देते हैं। अगर हम यहाँ चूकते हैं, तो शायद आने वाले समय में हमारे पास कुछ बचेगा ही नहीं—न यह पृथ्वी, न हम, और न ही हमारे बच्चे। फैसला आज करना है कि क्या करना है।"

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