"यह भी कोई ज़िंदगी है? कुछ समझ में नहीं आ रहा है कि क्या करना है और न ही यह समझ आ रहा है कि क्यों करना है। बस सब लोग कर रहे हैं, इसलिए 'करे जाओ-करते जाओ' वाला हाल है। जब कुछ नहीं करो तो करने का मन करता है, और जब कुछ करो तो लगता है कि जो कर रहे हैं उससे क्या उखाड़ लेंगे? न अपना कुछ कर पा रहे हैं, न दूसरों का। क्या कुछ ऐसा करने का कोई और रास्ता हो सकता है जिससे ज़िंदगी में सुकून मिले और अच्छा भी लगे? जीवन में एक अजीब सी बेचैनी है, आज कहीं भी ध्यान केंद्रित (focus) नहीं हो पा रहा है। शायद यह टेक्नोलॉजी के ज़्यादा इस्तेमाल की वजह से हुआ है। अब से बस एक काम को एक ही बार में पूरा करना है—जब लिख रहा हूँ, तो बस लिखता ही रहूँ और कुछ नहीं। यह बेचैनी सबको मुझसे बेहतर स्थिति में देख कर भी हो रही है; सबके पास कार है, पैसा है और मैं अगले हफ्ते से नौकरी शुरू करूँगा। हाँ, मुझे नई-नई किताबें पढ़ने में थोड़ा बहुत शौक है, चाहे वे हिंदी में हों या अंग्रेजी में, बस कहानी अच्छी होनी चाहिए।" "ज़िंदगी एक नदी की धारा की तरह ही होती है न? जब वह निकलती है तो अपने पूरे प्रवाह में होती है, अ...
Today i planted Moringa tree from stem we have one similar tree in front of our house since it grows very fast so i planted one stem which broke from it behind our house.I have erected the banana sapling which i uprooted from mother banana few days ago due to heavy rain the baby banana plant was bend.There are fruiting in my guava tree i put some soil around it since its becoming heavy on top and there is a fare chance that its may fall due to its own weight.There is one fruit which is little big big now and can be eaten in next 2 weeks.The maize have also fruited but due to rain water accumulating the fruits have not yet ripen.I have grafted one banana baby near my bedroom window and there is also one arhul flower which i rooted recently while pruning the mother plant.I am deciding to plant one gooseberry some mango 2 pomegranate,champa,rajnigandha plant sooner.I will also plant about 20 papaya and 10 banana good breed in backyard of my house the idea is to solve the fruit and ve...
अक्सर जब थोड़ा करीब से हर चीज़ को देखा जाए, तो यहाँ सब बहुत सामान्य (normal) लगने लगता है क्योंकि यह इंसान की फितरत बनती जा रही है कि दूसरे का शोषण करो अपने स्वार्थ के लिए। फिर अगर इंसान ही इंसान का शोषण करे, तो इसमें आश्चर्य की क्या बात है? जब एक सिस्टम का मकसद ही यही है कि वह ज़्यादा से ज़्यादा 'प्रॉफिट' बनाए अपने मालिक के लिए, तो इसमें क्या अचरज करना कि वह मालिक सबका शोषण करे खुद को ठीक रखने के लिए, और कोई ऐसा काम कर जाए जिसे कोई सोच भी न सके। इसीलिए हिंदू धर्म में शरीर, मन और प्रकृति को चेतना (Consciousness) के नीचे रखा गया है और हमें चेतना से भी ऊपर जाना है, जहाँ सब एक हो जाएँ—खुद में और इस मिट्टी या ब्रह्मांड में कोई अंतर न लगे। यह आश्चर्य की बात है न कि हम 'अचूक' (accurate) होते जा रहे हैं, फिर भी ज़िंदगी की गहराइयाँ खोती जा रही हैं। जितना सामान और सामग्री हम जुटा रहे हैं, उतना ही खुशी से दूर भागते जा रहे हैं। जितनी टेक्नोलॉजी हमें अपनों के पास ला रही है, उतना ही अपनत्व कम होता जा रहा है। पता नहीं कैसी अजीब सी दुनिया होती जा रही है, यहाँ कैसे लोग होते जा रहे हैं! ता...
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