पुरुषार्थ: भाग्य बनाम कर्म
रश्मिरथी: दानवीर कर्ण का महागाथा मैंने दिनकर जी की कविता 'रश्मिरथी' पढ़ी, जो वास्तव में एक उच्च कोटि की रचना है। इसमें कर्ण के चरित्र का जो चित्रण किया गया है, वह अद्वितीय है। महाभारत के युद्ध में, यह जानते हुए भी कि वह अधर्म के पक्ष में है, कर्ण जिस निष्ठा के साथ लड़ा, वह उसकी अटूट प्रतिबद्धता को दर्शाता है। एक अद्वितीय व्यक्तित्व कर्ण न केवल एक महान धनुर्धर था, बल्कि वह परम ज्ञानी और दानवीर भी था। उसकी वीरता ऐसी थी कि स्वयं भगवान कृष्ण भी विचार करते थे कि क्या वे अपने सुदर्शन चक्र से उसके पुरुषार्थ को रोक पाएंगे? अदम्य साहस: वह अपने विनाश को सामने देखते हुए भी विचलित नहीं हुआ। महादानी: वह ऐसा दानी था जिसने शीश झुकाकर वह सब कुछ दे दिया जो किसी ने भी उससे मांगा। स्वाभिमान: अर्जुन से लड़ने के लिए उसने अपना सब कुछ दांव पर लगा दिया। उसने कभी समझौता नहीं किया, न ही कभी झुका; उसने वही किया जो उसके अंतर्मन को सही लगा। संघर्ष और पुरुषार्थ की प्रतिमूर्ति हमें कर्ण के जीवन से बहुत कुछ सीखने को मिलता है। वह शरीर को मात्र एक मूर्ति मानता था, फिर भी उसी शरीर और अपने तप के बल पर उसने पूरे ...